Ras in Hindi-रस की परिभाषा भेद, उदाहरण सहित ( Hindi Grammar)

Ras in Hindi, रसों का सामान्य परिचय –  नमस्कार दोस्तों आज हम आप लोगों केलिए रसों का परिचय से सम्बन्धित जानकारी लेकर आए हैं जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण है तो दोस्तों नीचे दी गई जानकारी को ध्यान पूर्वक पढ़े क्योंकि यह जानकारी हिन्दी व्याकरण से सम्बन्धित है हम आपको बता दें की इससे सम्बन्धित प्रश्न सभी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं चाहे वह 10वीं हो या 12वीं कोई भी परीक्षा हो सब में यह रस पूछे जाते हैं रस कई प्रकार के होते हैं तो आप लोग इस रस से सम्बन्धित जानकारी को पूरा जरूर पढ़ें।

Ras in Hindi

  • श्रृंगार रस
  • वियोग शृंगार या विप्रलम्भ शृंगार
  • करूण रस
  • हास्य रस
  • वीर रस
  • शान्त रस

Ras in Hindi रस परिभाषा, भेद उदाहरण

शृंगार रस

जब रति नामक स्थायी भाव का विभाव, अनुभाव और संचरी भाव से संयोग होता है तो उसे श्रंगार रस कहते हैं श्रंगार रस के दो भाव होते हैं।

संयोग शृंगार

नायक नायिका के मिलने की दशा का वर्णन संयोग श्रंगार कहलाता है

बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।

सौंह करै भौहनु हँसै, दैन कहै नटि जाय।।

इस स्थान पर रति स्थायी भाव है आलम्बन विभाव है- श्री कृष्ण (विषय) नायिका (आश्रय) उद्दीपन विभाव है- एकान्त प्रदेश, बात का आनन्द लेना आदि अनुभाव हैं- मुरली का चुराना (आहार्य), शपथ खाना (मानसिक अनुभाव), भौंहों से मुस्कुराना (दैहिक अनुभाव), संचारी भाव है- हर्ष, चपलता, आशा, उत्सुक्ता आदि। इस प्रकार विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रति नामक स्थायी भाव यहाँ पुष्ट हो रहा है अतः संयोग श्रृंगार है।

वियोग शृंगार या विप्रलम्बन शृंगार

नायक नायिका के विरहावस्था के वर्णन को वियोग शृंगार कहते हैं। यथा-

तन मन सेज जरै अगि दाहू । सब कहे चन्द भयउ मोहि राहू ।।

चहूँ खण्ड लागे अँधियारा । जो घर नाहिं कान्त पियारा ।

इस छन्द में जायसी ने विरहिणी नागमती के विरह का वर्णन किया है यहाँ पर विभाव – अनुभाव आदि इस प्रकार हैं –

स्थायी भाव- रति, आश्रय नागमति, आलम्बन -रतनसेन, उदीपन विभाव – सेज चन्द्रमा, संचारी भाव -स्मृति, चपलता, आवेग, उन्माद, विषाद, दैन्य आदि हैं इनके संयोग से विप्रलम्ब शृंगार रस के निम्न लिखित स्थायी भाव, अनुभाव और संचारी भाव होते हैं-

स्थायी भाव – रति

आलम्बन – नायिका

आश्रय – प्रेमी (नायक)

उद्दीपन – संयोग में रूप – दर्शन, वियोग में स्मृति,

अनुभाव – चुम्बन (संयोग में), क्रोध, शंका, चिन्ता आदि (वियोग में)

उदाहरण- मेरो सब पुरूषारथ थाको।

विपत्ति बँटावन बन्धु बाहु बिन, करौ भरोसौं काको।।

सुनु सुग्रीव सांचेहु मोपर, फेरयो बदन विधाता।

ऐसे समय समर संकट हौं, तज्यो लखन सो भ्राता।।

करुण रस

शोक अथवा दुःख की अवस्था में जो शोक का स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव का सहयोग पाकर पुष्ट होता है, वह करूण रस कहलाता है यद्यपि वियोग शृंगार में भी आश्रय के हृदय में दुःख होता है, किन्तु वहाँ मिलन की आशा रहती है, अतः वहाँ शोक स्थायी भाव न होकर संचारी भाव ही रहता है, अतः करूण रस वियोग शृंगार से सर्वथा भिन्न है।

स्थायी भाव – शोक

आलम्बन – विनष्ट, ऐश्वर्य आदि

आश्रय – नायक या नायिका

उद्दीपन – शव दाह, कर्म आदि

संचारी भाव – ग्लानि, चिन्ता, स्मृति, विषाद, जड़ता, उन्माद, दैन्य, निर्वेद, मोह, अपस्मार आदि।

उदाहरण- इस करूणा कलित हृदय में,

                अब विकल रागिनी बजती।

                क्यों हाहाकार स्वरों में,

                वेदना असीम गरजती।।

हास्य रस

विलक्षण आकृति, विकृत चेषटाएँ, वचम या कार्य देखकर हृदय में उत्पन्न हास नामक स्थायी भाव, विभाव और संचारी भाव के संचारी भाव से हास्य रस का रूप ग्रहण करता है हास्य रस सम्भवतः सभी रसों में सुखात्मक रस होता है हास्य दो प्रकार के होते हैं- जो हास्य स्वतः उत्पन्न हो जाता है उसे आत्मस्थ हास कहते हैं जो हास्य दूसरे को हँसते हुए देखकर उत्पन्न होता है उसे परस्थ हास्य कहते हैं।

हास्य की 6 दिशाएँ हैं-

  1. स्मित
  2. हसित
  3. विहसित
  4. उपहसित
  5. अपहसित

हास्य के स्थायी भावादि इस प्रकार हैं- संचारी भाव – हर्ष, चपलता,     अनुभाव – आँखों का खिलना, होंठों का हिलना।

उदाहरण- विन्ध्य के वासी उदासी तपो व्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे।

                 गौतम तीय तरी तुलसी, सो कथा सुनिभे, मुनिवृन्द सुखारे।।

                 हृैहैं सिला सब चन्द्रमुखी, परसें पद मंजुल कुंज तिहारे।

                 कीन्हीं भली रघुनायक जू, करूना करि कानन को पगु धारे।।

वीर रस

उत्साह नामक स्थाय भाव, विभाव और संचारी भाव के संयोग से वीर रस की दशा को प्राप्त होता है। भरत मुनि के अनुसार शृंगर, रौद्र और वीभत्स रसों की भाँति वीर रस भी मूल रस है साहित्य शास्त्र के अनुसार चार प्रकार के वीर माने जाते हैं-

  1. युध्द वीर
  2. दान वीर
  3. दया वीर
  4. धर्म वीर

इसके स्थायी भावादि इस प्रकार हैं-

स्थायी भाव – उत्साह

अलम्बन – शत्रु

उद्दीपन विभाव – शत्रु की चुनौती, रणभेरी

अनुभाव – आश्रय के अंगों का फड़कना, आक्रमण करना, शस्त्र प्रहार।

आश्रय – नायक

संचारी भाव – स्मृति, धृति, अमर्ष, वितर्क, हर्ष, गर्व, उग्रता आदि।

उदाहरण – मंगल सगुन होंहि सब काहू । फरकहिं सुखद विलोचन बाहू।

                 भरतहि साहस समाज उछाहू । मिलहहि राम मिटहि दुख दाहू।।

 शान्त रस

निर्वेद नामक स्थायी भाव, विभाव और संचारी भावों के संयोग से शान्त रस की दशा को प्राप्त होता है इसके स्थायी भावादि निम्न लिखित हैं।

स्थायी भाव – निर्वेद

उद्दीपन – वेदान्त, धर्मोपदेश, धार्मिक, वातावरण, श्मशान।

आलम्बन – सृष्टी की निस्सारता

आश्रय – संसार के विरक्त पुरूष

अनुभाव – रोमांस, पुलक, तल्लीनता, धैर्य, स्मृति

संचारी भाव – धृति, मति, हर्ष, स्मरण, वियोग आदि।

उदाहरण – अबलौं नसानी अब न नसैहौं।

                 राम कृपा भव निसा सिरानी, जागे फिर न डसैहौं।

                 पायौ नाम चारू चिन्ता मनि, उर करतें न खसैहौं।

                 स्याम रूप रूचि रूधिर कसौटी, चिन्त कंचनहि कसैहौं।

                 परबस जानि हंस्यो इन इन्द्रिन, निज बस हृै न हँसैहौं।

                 मन मधुकर पन करि तुलसी, रघुपति पद कमल बसैहौं।

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तो दोस्तों कैसी लगी हमारी Ras in Hindi की पूरी जानकारी आशा करते हैं आप लोगों को काफी पसंद आई होगी तो आप इस पोस्ट को अपने मित्रों को भी शेयर कर सकते हैं अगर आपको इससे सम्बन्धित कोई जानकारी या अन्य जानकारी चाहिए तो नीचे दिए गए Comment Box के माध्यम से Comment कर सकते हैं।

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